क्या इस एनकाउंटर से भेड़िए डरेंगे ?


पुष्पा सिंह विसेन राष्ट्रीय अध्यक्ष नारायणी साहित्य अकादमी आज हमारे देश की दशा एवं दिशा दोनों ही ठीक नहीं है।जो घटनाएं हो रही हैं वह बहुत शर्मनाक है।नारी जाति की जिंदगी करता इतनी सस्ती हो गयी है।पुरुषों की नजरों में?यह प्रश्न उद्वेलित करता रहता है मुझे।आज भी उत्तर के लिए मन बेचैन है कि हमारे उत्तर प्रदेश में उन्नाव की पीड़िता को जिंदा जलाने का जो कु कृत्य हुआ है वह बहुत ही घृड़ित है और शर्मनाक भी।ऐसे अपराध करने वालों को तो तेजाब के ड्रम में उल्टा लटकाकर जिंदा डूबो डूबो कर मारना चाहिए।जिससे अपराधियों को तड़पते हुए यह एहसास हो कि उन्होने किसी लड़की को जला कर तड़पाया है।हमारे प्रदेश के सत्ताधारी अपराधियों का मन कैसे योगी जी के राज्य में बढ़ रहा है जो ऐसा दुस्साहस कर रहे हैं।आज हैदराबाद के जैसा इंसाफ ही सभी राज्यों में होना चाहिए। 


मानवतावादी विचारक मानवाधिकार की दुहाई देते हुए यह क्यों भूल जा रहे हैं कि बालात्कार के बाद जला देनेवाली बेटियों के मानवाधिकार नहीं होते हैं क्या? हमारे देश की इन बेटियों की तेरहवीं से पहले अगर सजा दें दी जाए तब तो ठीक है।किन्तु ऐसा संभव नहीं है। निर्भया के केस को अभी तक क्या लटकाना चाहिए।यह एक बहाना है कि जल्लाद की कमी है।मैं तो कहना चाहूंगी कि ऐसी बेटियों के गुनहगारों को तो स्वयं उनके माता पिता भी रस्सी खींच कर फांसी की प्रक्रिया पूरी कर सकते हैं।यह अच्छी श्रृद्धांजलि होगी बेटियों के प्रति मां बाप की ओर से।यह हमारी सरकारों को तय करना हैं।सरकारों से मतलब कि राज्य सरकार एवं केंद्र सरकार।
आत्मा कांप जाती है जब किसी बेटी के बालात्कार की खबर सुनती हूं ।तब जी करता है कि तलवार उठाऊं और सिर कलम कर दूं उन हैवानों का।फिर घंटों मां आदिशक्ति के साथ बातें करती हूं कि मां इतना निडर करो कि चामुंडा बन कर बेटियां लड़ सकें।और विजयी बनें।हमारी मासूम बेटियां हार जाती हैं अपनी पवित्रता बचाते बचाते और जान भी गंवा बैठती हैं।यह तो तय है कि वह भरपूर युद्ध करती हैं।और अनेक के बीच एकल परास्त हो जाती है।अगर हैदराबाद जैसे ही गोली मारी देने का प्रावधान न्यायिक प्रक्रिया द्वारा एक सप्ताह में होना आरम्भ हो जाए तो बहुत ही अच्छा होगा।
और अगर इन बालात्कारी मानसिकता वालों को पहले ही समझ लिया जाए तो हमारे देश में ऐसी घटना ही न हो। भारतीय लोगों की छवि विश्वपटल पर बहुत ही शर्मनाक है।क्योंकि हमारे यहां भ्रूणहत्या जैसे जघंन्य अपराध भी सदियों से होते आ रहे हैं। यह हम सभी जानते हैं।लेकिन आज जहां प्रगति के नाम पर हमारा देश कहां से कहां पहुंच गया है।किंतु अपराध के मामले में वहीं का वहीं है।अनेक प्रकार के अपराधों की बहुलता वाला देश कहने में जरा सा भी संकोच मुझे नहीं हो रहा हैं।हम कैसी परवरिश दे रहे हैं अपनी भावी पीढ़ी को?यह यक्ष प्रश्न बन गया है।जब मां और पिता व परिवार मिल कर अपने बच्चों को लायक नहीं बना पा रहा है यह चिंता का विषय है।ऐसे परिवारों को संज्ञान में रखते हुए।उनकी कमियों को दूर करने की निति भी सरकार को बनानी चाहिए।और तहसील स्तर पर लागू करना चाहिए जिससे सर्वसमर्थ एवं स्वस्थ मांसिकता वाले समाज का निर्माण किया जा सके।हमें हमारे देश में रहने पर गर्व हो।आज जितनें ढोल नगाड़े बजे है वह देख कर मन खुश हुआ।लेकिन चिंता भी हुई कि समाज में विचरण करने वाले बालात्कारी डरेंगे?करता ऐसी घटना की पुनरावृत्ति नहीं होगी।या कुछ व्याभिचारी अभी जल्द ही ऐसी घटनाएं करके बताएंगे न कि हमें जान जाने का कोई डर नहीं है।ऐसे भेड़ियों की पहचान आवश्यक है। हम नारियों को सतर्क रहना चाहिए ।घर से बाहर तक ऐसे लोग भरे पड़े हैं।हमें हमारी सतर्कता बरतने में ही हमारी भलाई है।और विषम परिस्थितियों में डट कर लड़ने की जरुरत है।भारत की छवि को बदलने के लिए बहुत ही चिंतन विचार की आवश्यकता है।कि हम हमारे समाज से ऐसी सोच वाले लोगों की पहचान व गणना कैसे कर सकते हैं।जिससे समाज के ऐसे लोगों के सुधार की व्यवस्था अपनाई जाए। बेटियों की असलियत,इज्जत और जान बचाई जाए।