दीपक चौरसिया जैसी घटनाओं से बचना होगा शाहिन बाग को


नस्लवादी क़ानून के ख़िलाफ दिल्ली के शाहीन बाग़ में चलने वाला महिलाओं का आंदोलन ‘सत्ताधारी मीडिया’ और ‘सत्ताधारी एंकर्स’ की आंखों की किरकिरी बना हुआ है। पहले आंदोलनकारी महिलाओं पर आरोप लगाया गया कि वे पांच सो रुपये लेकर धरना दे रही हैं, जब वह झूठ बेनक़ाब हुआ तो फिर दूसरे तरीक़े से इस आंदोलन को बदनाम करने की साजिश की गई। लेकिन आज दीपक चौरसिया के साथ जो हुआ है, वह एक तरह से इस अहिंसक तरीक़े से चलने वाले आंदोलन के ख़िलाफ है। हो सकता है कुछ लोग इसी से खुश हों कि दीपक चौरसिया के साथ जो हुआ वह सही हुआ है, लेकिन फिर भी वह गलत है, और उसे गलत ही कहा जाएगा। अभिव्यक्ति की आज़ादी हर नागरिक का मौलिका अधिकार है, इसका हनन करना संवैधानिक नही है। अहिंसावादी आंदोलन में इस तरह की हरकतें आंदोलन को कमज़ोर ही करतीं हैं। अब भाजपा आई.टी. सेल द्वारा दीपक चौरसिया प्रकरण को मनमाने तरीक़े फैलाया जाएगा, और इस आंदोलन को बदनाम करने की साजिश और तेज़ होगी, बेशक इससे शाहीन बाग़ आंदोलन को कोई फर्क नहीं पड़ेगा लेकिन, शाहीन बाग़ तमाम दायरे तोड़ चुका है। लेकिन दीपक चौरसिया प्रकरण शाहीन बाग़ से बहुत दूर यूपी उत्तराखंड में रहने वाले लोगों को प्रभावित कर सकता है। वह शख्स जो न्यूट्रल है वह इस तरह की हरकतें देखकर ही निर्णय लेता है, निर्णय बदलता है, राय बदलता है। लिहाज़ा उसका ख्याल रखा जाए, और इस तरह की हरकतें भविष्य में नहीं चाहिए, वे आंदोलन के लिये खतरनाक ही साबित होंगी, और सरकार की मंशा भी पूरी होगी।